ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य पद को लेकर वर्षों से चला आ रहा विवाद एक बार फिर चर्चा में है। जानिए काशी से संबंध, इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश, स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती और स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से जुड़ा पूरा घटनाक्रम।
ज्योतिष पीठ और काशी का ऐतिहासिक संबंध
भारतीय सनातन परंपरा को संगठित करने के उद्देश्य से आदि शंकराचार्य ने देश के चार कोनों में चार प्रमुख मठों की स्थापना की थी। इन्हीं में से एक ज्योतिष पीठ (ज्योर्तिमठ) का काशी से गहरा और ऐतिहासिक संबंध माना जाता है। यही कारण है कि इस पीठ के शंकराचार्य पद को लेकर उठने वाला हर विवाद धार्मिक और सामाजिक स्तर पर चर्चा का विषय बन जाता है।
माघ मेले से जुड़ा ताजा विवाद
हाल ही में प्रयागराज में आयोजित माघ मेले के दौरान स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को स्नान की अनुमति न मिलने के कारण विवाद और गहरा गया। इस घटना के बाद सामने आए कुछ वीडियो, जिनमें बटुकों के साथ दुर्व्यवहार दिखाया गया, ने साधु-संत समाज में रोष पैदा कर दिया। इसके साथ ही ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य पद को लेकर चल रहा पुराना विवाद फिर से सुर्खियों में आ गया।
इलाहाबाद हाई कोर्ट का 2017 का आदेश
वर्ष 2017 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य पद को लेकर ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। कोर्ट ने स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती और स्वामी वासुदेवानंद, दोनों के दावों को खारिज करते हुए स्पष्ट किया था कि 1941 की डीड के अनुसार ही नए शंकराचार्य का चयन किया जाना चाहिए।
कोर्ट के निर्देशों के तहत यह जिम्मेदारी भारत धर्म महामंडल, काशी विद्वत परिषद और द्वारका, श्रृंगेरी व पुरी पीठ के शंकराचार्यों को सौंपी गई थी।
चयन प्रक्रिया से पहले ही अभिषेक का विवाद
हाई कोर्ट के आदेश के बावजूद, चयन प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही भारत धर्म महामंडल के एक गुट द्वारा स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का अभिषेक कर दिया गया। इसी निर्णय ने विवाद को और जटिल बना दिया, जो आगे चलकर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया। वर्तमान में यह मामला शीर्ष अदालत में लंबित है।
काशी में शास्त्रार्थ से हुआ था पहला चयन
ज्योतिष पीठ की पुनः खोज का श्रेय 1941 में भारत धर्म महामंडल की स्थापना करने वाले स्वामी ज्ञानानंद को जाता है। उन्हीं के प्रयासों से पीठ का जीर्णोद्धार संभव हो सका।
काशी के टाउनहॉल मैदान में आयोजित शास्त्रार्थ के माध्यम से स्वामी ब्रह्मानंद को पहला शंकराचार्य चुना गया था, जो इस पद की ऐतिहासिक शुरुआत मानी जाती है।
मठाम्नाय ग्रंथ का महत्व
बीएचयू के ज्योतिष विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. विनय कुमार पांडेय के अनुसार, शंकराचार्य पद से जुड़ी सभी व्यवस्थाएं मठाम्नाय अनुशासन ग्रंथ पर आधारित होती हैं। इसी ग्रंथ में शंकराचार्य की योग्यता, नियुक्ति, कर्तव्य और आवश्यकता पड़ने पर पद से हटाने तक के नियम स्पष्ट रूप से वर्णित हैं।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की नियुक्ति और विवाद
स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के निधन के बाद 11 सितंबर 2022 को उनके उत्तराधिकार की घोषणा की गई। वसीयत के आधार पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को ज्योतिष पीठ और स्वामी सदानंद को द्वारका पीठ की जिम्मेदारी सौंपी गई।
हालांकि, निरंजनी अखाड़े और गोवर्धन मठ से जुड़े कुछ प्रमुख संतों ने इस नियुक्ति को मान्यता नहीं दी, जिससे विवाद और गहरा गया। इसके परिणामस्वरूप शंकराचार्य पद को लेकर कानूनी लड़ाई आज भी जारी है।
